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मनोज साबळे - कहानी एक हौसले की !

जब हम एक समाज की बात करते है तो कई अलग-अलग विचारधारा से बनी एक तस्वीर सामने आती है। अब वो तस्वीर दिखने मे कितनी अच्छी है या बुरी !! ये तो उस समाज मे रहने वाले लोगों की सोच पर निर्भर करता है, क्योंकि लोग ही मिलकर एक समाज बनाते है। हर व्यक्ति की अपनी एक कहानी होती है- अपनी बात होती है।

जिस व्यक्ति की बात हम कर रहे है, वो उन लोगों मे से एक है जिन्होंने अपने घर और समाज मे कोई फर्क नहीं समझा। वो है पुणे शहर के रहने वाले मनोज रामचंद्र साबळे। अक्सर दूसरे शहर मे जाकर किसी के लिए भी घुल-मिल पाना बहुत मुश्किल होता है, वही मनोज साबळे के लिए ये बेहद अलग अनुभव रहा। दिल्ली आए उन्हे सिर्फ कोई 3-4 साल ही हुए है और उन्होंने पूरे शहर को अपना लिया। जी हाँ, तभी तो Green Delhi को अपना मिशन बनाते हुए स्वच्छ भारत के सपने को पूरा करने मे लग गए। स्वच्छ भारत कभी भी एक इंसान का अकेला मिशन नहीं हो सकता, ये हम सबकी ज़िम्मेदारी है, जिसे आधे से ज्यादा लोग समझते नहीं। तो चलिये जानते है की आखिर ऐसा क्या विचार मनोज साबळे को आया की अच्छी-खासी नौकरी और पैसों के होते हुए भी उन्होने इस काम को करना चाहा।

अपने बारे मे कुछ बताइये।

मैं मनोज रामचंद्र साबळे, पुणे शहर का रहने वाला हूँ। जहां से मैंने कम्प्यूटर सायंस की पढ़ाई की और आज इन्फर्मेशन टेक्नॉलजी के क्षेत्र मे एक सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल के तौर पर दिल्ली मे काम करता हूँ। जहां मे पिछले 3-4 सालों से अपने परिवार के साथ रहता हूँ। मेरी पत्नी विदुला परिवार के लिए 24/7 जॉब करती है, कहने का मतलब है वो हाउस मेकर है । मेरा बेटा पलाश आठ वर्ष का है और वो तिसरी कक्षा मे पढाई करता है। मेरे माता-पिता, छोटे भाई का परिवार पुणे शहर के कात्रज गांव मे रहता है।

मैं अपने आपको काफी भाग्यवान समझता हूँ की वर्ष 2014 मे देश के सबसे बडे eGovernance प्रोजेक्ट के टेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट में मुझे Software Estimation Expert के पद पर काम करने का अवसर मिला। आज मैं गुरुग्राम मे एक सॉफ्टवेयर कंपनी Interglobe Technologies मे Sr. Project Manager के पद पर काम करता हूँ।

आप स्वच्छता अभियान के अंतर्गत क्या-क्या काम करते है? कहाँ पर कूड़ा जमा होता है? कैसे खाद बनाते है? कुछ बताइये।

मैं अक्सर रविवार को सफाई करने के लिए निकलता हूँ। जो भी सफाई का काम मै करता हूँ, मेरी पत्नी उन लम्हों को सजोने के लिए उनकी फोटो खिच लेती है। साथ मे मेरा बेटा पलाश भी होता है , जो मेरा काम देख, खुद भी सफाई करने की जिद करता है। समय के साथ-साथ विदुला और पलाश ने भी युनिफॉर्म पहनकर काम करना शुरु कर दिया।

कूड़ा जमा करने का काम हमने एक घर से शुरू किया था, जिसका आंकड़ा बढ़कर अब 125 घरों तक जा पहुचा है। इसके अलावा पीछले पांच महीनों मे हमने “बसई दारापुर गांव” के कुल 125 घरों से लगभग 3700 किलो रसोई-कूड़ा इकट्टा किया है। जिसमे से 40 % गाय को खिलाये जाने वाली चीज़ निकली और बाकी 60% कूड़े को खाद बनाने मे उपयोग किया गया है। इसके अलावा सर्वोदया कन्या विद्यालय के अंदर चार वर्षों से जमा कूड़े को साफ करने के अलावा लगभग 2000 किलो कूड़े की खाद बनायी गई है। अभी जगह की कमी के कारण और घरों को जोड़ पाना थोड़ा मुश्किल हो रहा है, पर हमें विश्वास है जल्द ही हम अपनी क्षमता को सुधार लेंगे।

ये ग्रीन दिल्ली मिशन क्या है ?

मेरा एक सपना है कि मेरा देश स्वच्छ हो और उसकी शुरुआत पहले मुझे अपने प्रदेश से करनी होगी। दिल्ली को स्वच्छ बनाने का संकल्प ही "ग्रीन दिल्ली मिशन" है। इसकी शुरुआत मैंने अपने क्षेत्र (बसई दारापुर, नई दिल्ली ) से करी। मुझे ऐसा लगता है की - समस्या कूड़ा नही है, बल्कि उसकी व्यवस्था (Waste Management) समस्या है। समस्या की जड़ है कूड़े का मिश्रण। गिला कूड़ा, सूखा कूड़ा, इलेक्ट्रॉकल कूड़ा, मेडिकल कूड़ा- सब एकत्रित होकर कूड़ा घर मे जाता है और इस तरह वो मिक्स कूड़ा खराब हो जाता है। वैसे देखा जाये तो कूड़े से कोई धनवान भी बन सकता है, परंतु वर्षों से चली आयी व्यवस्था से समस्या और भी जटिल बन गई है। केंद्र के पल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली मे एक दिन मे 9260 मेट्रिक टन कूड़ा निकलता है और उसका लगभग आधा कूड़ा Dump किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि Waste Management के लिए Decentralized Model का उपयोग किया जाना चाहिए। आज की तारीख मे इतने सारे कूड़े को संभाल पाने मे दिल्ली के चार डंपिंग यार्ड भी सक्षम और सुनियोजित नही है।

हमारा उद्देश्य है - कूड़े को कम करना है, उसको संभालना है, उसका पुन: उपयोग, Recycle करना है। यह करते-करते एक मॉडल बनाना है, जिसका नाम हमने “बसई मॉडल” रखा है। यह मॉडल भविष्य मे एक मानक तय करेगा। इसके साथ ही हम अपने ग्रीन दिल्ली मिशन को भी प्राप्त कर सकेंगे।

मैं स्वच्छ भारत मिशन का यह काम पिछले तीन वर्षों से कर रहा हूँ। जिसे करने मे मुझे काफी मज़ा आ रहा है।

एक टीम को जोड़ पाना कितना मुश्किल रहा? हर कोई ऐसे कामो की तारीफ तो करता है, पर हकीकत मे उससे जुडने से हिचकता है। क्या कहेंगे इस बारे मे?

आपकी बात बिल्कुल सच है कि लोग सराहना तो जरूर करते है, परंतु जमीनी स्तर पर साथ निभाने नही आ पाते। खैर सबकी अपनी समस्या है, अपने कारण है। जहां तक बात है एक टीम की - वो मेरे लिए कोई समस्या नहीं थी, क्यूकी वो मुख्य उद्देश्य नहीं था। जो बात मेरे लिए अहम है वो स्वच्छ भारत मिशन है, कूड़ा समाप्त करना है, काम करना है और उसे संभालना रखना है। ख़राब चीज़ों को रीसायकल करके उनका फिर से इस्तेमाल करना है। बाकी उद्देश्य पर बने रहने से टीम भी बनती चली जाती है।

अपनी टीम के बारे मे यही कहूँगा की वो मेरी सबसे बड़ी ताकत है, जो मुझे हर कदम पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। शुरुवात मे मैं अकेला चला था, धीरे-धीरे पत्नी और बेटे भी आकर इस मिशन मे शामिल हो गए। मैं नहीं जानता था की इस काम मे आगे और कितने लोग साथ देंगे, पर आज मेरी टीम मे छोटी उम्र से लेकर 40 साल की उम्र तक के लोग है। जो अलग-अलग क्षेत्र मे काम करते है।

रजनीकांत, आकाश, अनिल, विकास, प्रमोद, मंजू, रवी, कपिल, चंद्रकांत- ये मेरी टीम के वो लोग है, जिन्हे मे दिल से धन्यवाद देना चाहता हूँ, इस मिशन से जुड़ने और इसे आगे बढ़ाने के लिए। इसके अलावा उम्मीद रहेगी की हमारी ये छोटी सी टीम आगे चलकर और बड़ी होगी, लोग जुड़ेंगे और स्वच्छ भारत मिशन कामयाब होगा।

आपने दिल्ली के सीएम तक को अपने इस कार्य के लिए चिट्ठी लिखी थी। तो क्या जवाब मिला उनकी तरफ से? कोई सहायता?

हाँ, बिल्कुल सही, मैंने चीफ़ मिनिस्टर जी को भी अपने इस “ग्रीन दिल्ली मिशन” के बारे मे पत्र लिखा था, ताकि काम को बड़े स्तर पर चलाया जा सके। वो पत्र एक-दो डिपार्टमेंट तक भी पहुंचा, पर फिलहाल कोई जवाब उनकी तरफ से नहीं मिल पाया है, पर इससे हमारे हौसले मे कोई कमी नहीं आई है।

आपने अपने काम से सम्बंधित काफी विडियो सोशल मीडिया पर भी शेयर किए है, क्या सोशल मीडिया से आपको कोई सहयोग मिल रहा है ?

मैंने सोश्ल मीडिया पर “स्वच्छ भारत अभियान” से जुड़ी अपनी कुछ वीडियो जरूर डाली है, पर वहाँ से कोई खास सहायता नही मिली। वैसे सोशल मीडिया पर हर विडियो का अपना एक अलग महत्व होता है। लोग क्या देखना चाहते है,-पढ़ना चाहते है, वो पूर्ण रूप से उनकी पसंद पर निर्भर करता है। मुझे लगता है कि स्वच्छ भारत का मिशन लोगों के लिए सिर्फ एक पसंद ना बनकर रह जाये, बल्कि लोग इसकी जरूरत को समझे।

अच्छी नौकरी होने के बावजूद भी ये काम करने का कैसे सोचा?

पहले मेरा स्वप्न था, कि किसी बड़ी कंपनी मे बडे पद पर काम करूँ, विदेश मे काम करूँ, इत्यादी। 2011 मे भारत की क्रिकेट वर्ल्डकप की जीत के उत्सव के बाद, श्री अण्णा हजारे जी का भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन ने सभी की तरह मेरा भी ध्यान आकर्षित किया। जब श्री अण्णा हजारे जी का दुसरा आंदोलन हुआ उस समय तक मैं बिल्कुल अपने आप मे बदलाव देख चुका था। तब मुझे विश्वास हुआ की मज़ा विमान मे बैठकर जापान जाकर काम करने मे नही है। असली आनंद समाज में कुछ अच्छे बदलाव करने मे है, किसी के जीवन का स्तर ऊंचा करने मे है। मनुष्य की पहचान क्या है - सारा समय अपने परिवार को संभालता है। उनका भविष्य बनाने का प्रयास करता है। बिलकुल उसी तरह उसे अपने समाज (देश) के लिए भी कुछ करना चाहिए।

नौकरी के लिए मुझे हर दिन 12 घंटे देने होते है। यानि शुबह 7 बजे से शाम के 7 बजे तक। जिसके बाद ही मैं स्वच्छ भारत मिशन के कार्य को वक़्त दे पता हु। बाकी शनिवार-रविवार छुट्टी के दिन मे सुबह के 4-5 घंटे देता हूं। पहले परिवार के लिए मेरे इस काम को समझ पाना मुश्किल था, पर आज मेरी पत्नी और बेटा भी इस मिशन मे शामिल हो चुके है। घर का सारा काम मेरी पत्नी ने अकेले ही संभाला हुआ है, ताकि मैं अपने इस काम को समय दे सकूँ। हाल तो ये है की अब ये मिशन पहला काम बन चुका है और घर की जरुरत दुसरा काम बन चुकी है।

शुरुवात मे मैं केंद्र सरकार के पल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की वार्षिक निरीक्षण की रिपोर्ट बनाकर उसका पावरपांईट प्रेजेंटेशन बनाता था, ताकि आम लोग उसे आसानी से समझ सके। उस रिपोर्ट को मैंने फिर सर्वोदया कन्या विद्यालय और दक्षिण दिल्ली नगर निगम जाकर प्रिंसिपल के सामने रखी, जहां से अच्छी प्रतिक्रिया मिली। विद्यालय ही नहीं बल्कि हमने मंदिर, सार्वजनिक स्थानों, दुकानों तक जाकर लोंगों को स्वच्छता का महत्व समझाने के अलावा सुखा और गिला कूड़ा छांटने की जरूरत भी बताई।

हमारे काम करने के घंटे कई बार बदलते रहते है। जैसे की हर रविवार को 5-6 घंटे काम होता है, तो प्रति दिन शाम को 2 घंटे काम के निर्धारित हो जाते है। फिर कई बार प्रतिदिन 3 घंटे का समय बनाकर, रविवार को 5 घंटे निर्धारित कर दिये जाते है। इस तरह हमारा काम काफी अच्छी तरीके से आगे बढ़ रहा है।

अधिकतर लोगों की सोच संकुचित होती है, सिर्फ वही तक सोचते है, जहां तक खुद का स्वार्थ होता है। ऐसे मे आप लोगों को क्या संदेश देना चाहते है?

हम लोगों को ये बता सकते है कि “स्वच्छ भारत मिशन” का जो काम हम पिछले तीन सालों से कर रहे है, अब वो रुकने वाला नहीं है। यदि हम जैसे कुछ लोग 3000 किलो कूड़े को सही तरह से प्रबंधन कर सकते है तो सोचिये अगर सब लोग इस काम में जुट जाये, तो हमारा देश जल्द ही स्वच्छ हो जायेगा।

मनोज साबळे के साथ हुई एक छोटी सी मुलाक़ात से हमने ये जाना की अगर हर इंसान कूड़े को सही तरीके से Decompose करना सीख जाये, तो आधे से ज्यादा समस्या सुलझ जाये। आज चाहे हम अपने आपको कितना पढ़ा-लिखा या प्रगतिशील बना ले, फिर भी देश मे कूड़े की समस्या को सुलझाना मुसीबत बना हुआ है। गीला कूड़ा और सूखा कूड़ा दोनों ही मिलकर बेकार हो जाते है, जिसके ढ़ेर जगह-जगह नज़र आते है।

देश मे ऐसी कोई बड़ी तकनीक इजात नहीं हो पा रही है, जो कूड़ा -मुक्त वातावरण देश को दे सके। अब या तो हम लोग किसी बड़ी तकनीक के आने तक का इंतज़ार करे, या फिर मनोज साबळे जैसे लोगों के प्र्यासों व कार्यो को आगे बढ़ाए, उनका साथ दे। ताकि हमारी आज की ये छोटी कोशिश, कल को एक प्रेरणा बन, देश को सुंदर छवि दे सके।