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आखिर भारत क्यों पिछड़ता है, ओलिंपिक में ?

विकसित भारत का सपना तो हम सभी कभी न कभी देखते है या यू कहे ये एक ऐसी कल्पना है जिसके साकार रूप मे आने का इंतज़ार सभी को है। पर वो कौन से मूल सिद्धांत है जो इस सपने का आधार बनते है।

पी वी सिंधु व साक्षी मलिक जैसे खिलाड़ियो को मिले सिल्वर और ब्रॉन्ज मेडल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की मौजूदगी को दर्ज तो करवाते है, पर फिर भी विकास की बात आते ही सबका रुख देश के इकनॉमिक व बिज़नस क्लास या फिर इंफ्रास्ट्रक्चर इंडस्ट्री की ओर ही जाता है। पर जब भी ओलिंपिक जैसा कोई अंतर्राष्ट्रीय खेल आयोजित होता है तो सबकी नज़र देश का प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाड़ियों पर रहती है।

कौन कितने मेडल लाया उसका हिसाब-किताब मीडिया करती है। ‘शोभा डे’ जैसी नामचीन लेखिका , देश की तरफ से भेजे खिलाडियों की काबलियत पर फबतिया कसती हुई नज़र आती है। तो कभी ब्रिटिश राज्य के एक जाने-माने पत्रकार Piers Morgan भारत को मिले मेडल की तुलना इसकी पूरी आबादी से करते हुए देश की हंसी उड़ाते है। हम सबके पास इसका भी उपाए है। सोशल मीडिया का सहारा लेकर कुछ दिनों तक पूरी जनता पलटवार करती है ऐसे लोगों पर। दिल का सारा गुमान निकालने के लिय शब्दों का बड़ा ही रचनात्मक ढंग से प्रयोग किया जाता है। लेकिन वक़्त सबपर भारी पड़ता है और समय के साथ-साथ एक ओलंपिक को भूल हम अगले ओलंपिक की ओर देखने लगते है। तो क्या पिछली गलती से कुछ सीखा गया !!!

हमारे देश में खेलों की ऐसी बदतर स्थिति, कही न कही सरकारी मशीनरीज़ और सरकार की लचर इच्छाशक्ति के कारण है। जहा एक तरफ़ चीन, जापान, अमेरिका, इंग्लैंड जैसे देश मेडल तालिका मे सबसे ऊपर दिखाई देते है, जो साफ़ इशारा करते है की वहा खेल को कितना महत्व दिया जाता है। ऐसे मे अगर अपने देश मे भी खेलों को उतना ही महत्व दिया जाये, तो हम भी काफी मैडल जीत सकते है। ।

शहरों की तुलना अगर गाँव से की जाये तो जमीन आसमान का फर्क नज़र आता है। गांवों में अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेल कूद की बात ही एक अपवाद है। इसके बावजूद भी कुछ गिने-चुने मेहनती लोग भी है जो अपनी काबिलयत के बल पर खेलों मे अपना नाम बनाते है। पर उन्हे वो सुविधा नहीं मिल पाती। उन्हे अपनी जीत के लिए एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। खेल मे मेडल जीतना आसान नहीं। ये भी एक लंबी और कठिन प्रक्रिया है, जिसपर आमतौर पर लोग जोखिम लेने से बचते है।

गाँव मे रहने वाले बच्चों के के लिए न तो कोई स्पोर्ट्स अकादमी है न ही खेल के मैदान। उनके लिए तो खेत और बाग़ ही खेल के मैदान है। जो कि अब समय के साथ साथ बढ़ती हुई आबादी के कारण समाप्त होते जा रहे है। जब खेत बिकते है तो वहा इमारते बनकर सिर उठाने लगती है। वक़्त के साथ-साथ गाँव का भी स्वरूप काफी बदला है। सरकार की कोशिशों ने गाँव तक अपने पंखों को जरूर फैलाया है, पर अभी भी काफी कसर बाकी है। दूसरी तरफ़ शहरों मे लगभग हर सुविधा होते हुए, यहां रहने वाले लोग रोजी-रोटी के इंतजाम में ही जुटे रहते है। उनका एक मात्रा धेय्य पैसा कमाना और बच्चो को सिर्फ उच्चशिक्षा दिलाना ही रह गया है।

हमारे देश में खेलों मे कोई भविष्य नज़र नहीं आने पर लोग इससे मुह मोड़ लेते है। जीवन व्यतीत करने के लिए सिर्फ पैसे की जरुरत होती है और पैसे सिर्फ पढ़ लिख कर नौकरी करने से ही आते है, इस विचारधारा ने कही न कही हमारे समाज को खेलों से दूर कर दिया है। हर माता-पिता अपने बच्चे को खेल-कूद से ज्यादा पढाई में बढ़ते हुए देखना चाहते है। ऐसे मे समस्या दो तरफ़ा हो जाती है। खेलकूद के नाम पर लोग घर के अंदर कंप्यूटर, मोबाइल इत्यादि पर खेल खेलना शुरू कर देते है। जो की शारीरिक और मानसिक तौर पर काफी नुकसानदायक होता है। ऐसे हालात में न तो आपको खिलाडी गांवों से मिलते है न ही शहरों से, अब ऐसे मे अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता मे काबिल खिलाड़ियो की पूर्ति पर सीधा असर पड़ता है। शहरीकरण की नई परिभाषा ने खेल जगत पर एक गहरा प्रभाव डाला है।

एक बड़ी आबादी वाले देश ने पिछले 3 दशक मे सिर्फ एक स्वर्ण पदक (2008 मे) हासिल किया है। ये बात सबको शर्मिंदा करती है। वित्तीय समस्या के अलावा देश मे खेल प्राथमिकता का केंद्र कभी रहा ही नहीं है। लेकिन अब सरकार को स्पोर्ट्स अकादमी खोलने के साथ-साथ ट्रेनिंग प्रोग्राम पर खासा तवज्जो देना होगा, जिसके लिए वित्तीय सहायता बेहद अहम है। लोगों मे स्पोर्ट्स के प्रति उत्साह बढ़ाने के साथ साथ उनमे स्पोर्ट्स स्किल डेव्लपमेंट के लिय नए नियम लागू करने होंगे, क्यूकी खेल सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि दुनिया को आपस मे जोड़ने की एक कड़ी है। एक ऐसी कड़ी जो देश को दुनिया के सामने प्रस्तुत करती है, ऐसे मे यकीनन सरकार को खेल जगत पर खास नज़र रखते हुए हर खिलाड़ी को वो सम्मान दिलाना होगा, जिसके वो हकदार है।