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भ्रष्ट भारतीय आरक्षण व्यवस्था।

आरक्षण की आग जिस तरीके से समाज को जला रही है, उसे देख लगता है कि देश के बुधीजीवियों के लिए इसको रोक पाना एक बड़ा काम है। कुछ वक़्त पहले मीडिया मे छाई ‘टीना डाबी’ की खबर ने तो इसको और हवा दे डाली । टीना डाबी के बारे मे बताया गया कि 22 साल की उम्र मे UPSC मे टॉप करके उन्होने अपनी जीत को ऐतिहासिक बना दिया। ऐतिहासिक जीत की खबर मीडिया मे आते ही देश के कोने-कोने से उन्हे बधाइया दी जाने लगी। पर कहते है न कि हर सिक्के के दो पहलू होते है। जल्द ही वो दूसरा पहलू भी सामने आया और टीना के जीत की दूसरी कहानी भी आम जनता के कानों मे पड़ी। 195 marks लाकर टीना ने 230 marks लाए अंकित श्रीवास्तव को मात दे दी। वास्तव मे ये अब एक ऐतिहासिक मुद्दा बन गया है। अंकित श्रीवास्तव की गलती बस इतनी थी कि उसको RESERVATION यानि आरक्षण का सहारा नहीं मिल सका, जबकि टीना UPSC मे टॉप करने वाली पहली दलित छात्रा है।

आज देश के SC / ST और OBC जाति के लोगो, आरक्षण के दम पर अपना 49.5 प्रतिशत हिस्सा सुरक्षित कर चुके है। इसने समाज मे हर चीज़ के मायने ही बदल दिये है। रिज़र्वेशन का अर्थ हुआ “सुरक्षित करना”। पर इन लोगो के अधिकार को जिस तरीके से सुरक्षित किया जा रहा है वो आज रोष का कारण बना हुआ है। एक इंसान काबिल होने के बाद भी देश मे चल रही ऐसी बुराइयों का शिकार बन जाता है।

इस बात को तो बिलकुल नक्कारा नहीं जा सकता कि आज से कई सालों पहले इस दलित जाति के साथ काफी भेद-भाव हुआ। समाज को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र चार वर्ण मे बाटने की पीछे क्या तर्क था, इसपर शायद आज लोगो ने सोचना बंद कर दिया, क्यूकी इंसान कौनसे वर्ण का है ये उसे बच्चपन से ही बता दिया जाता है। उस वक़्त को भी नहीं भुलाया जा सकता जब एक वर्ण को अछूत माना जाता था। समाज उससे दूरी बनाकर रहना पसंद करता था। पर आज उस भेद-भाव की खाई को जिस तरीके से पाटा जा रहा है वो हैरान करने वाला मंजर है। RESERVATION के माध्यम से हर वर्ण मे जो संतुलन बनाने की कोशिश हो रही है वो कारगर साबित नहीं हो पाई है। रिज़र्वेशन का इतिहास देश की आज़ादी से भी काफी पुराना है। “लोहा लोहे को काटता है”- इस कहावत को आज इतना अमल मे लाया जा रहा है की समाज मे फैली बुराइयों को भी बुराई से ही मात देने की कोशिश की जा रही है।

लेकिन फिर भी अंकित श्रीवास्तव जैसे कुछ लोग सामने आने की हिम्मत करते है। अंकित ने अपने facebook पर दोनों की मार्कशीट को पोस्ट करके टीना की कामियाबी की खबरों को दूसरी दिशा मे मोड दिया। उसके बाद नई चर्चाए शुरू हुई। पर बात तो सिर्फ इतनी है कि कैसे एक इंसान अपने सवैंधानिक अधिकार के आधार पर आगे बढ़ जाता है और वास्तव मे जो असली काबलियत रखता है पीछे रह जाता है।

सरकार या तो फिर हर व्यक्ति के लिए सवैंधानिक अधिकार का एक मजबूत ढ़ाचा तैयार करे। ताकि हर इंसान अपनी सफलता की गारंटी जेब मे लेकर घूम सके। अंत मे कह सकते है की ये मुद्दा किसी टीना डाबी नाम की लड़की के खिलाफ नहीं है, बल्कि पूरी कहानी तो कानूनी तौर पर चल रहे नियमों पर आधारित है। ये वो कानून है जो किसी के साथ नयायपूर्ण है तो किसिके खिलाफ कार्य करता है। तो भला अंकित श्रीवास्तव जैसे दूसरे लाखों लोगों का क्या होगा? क्या कानून उनके पक्ष मे कोई नया नियम बनाकर समाज मे संतुलन बना सकता है? वैसे ऐसे कुछ मुद्दों पर चलने वाली चर्चाए अभी तक तो कोई समाधान नहीं ला पाई है, पर फिर भी समाज का प्रतेक वर्ग हर कीमत पर संतुलन चाहेगा।