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भारतीय कृषि व्यवस्था।

आज देश की अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाने मे अगर सबसे ज्यादा भागीदारी किसी की है तो उसमे सबसे पहले कृषि क्षेत्र का नाम लेना गलत नहीं होगा। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने ‘जय किसान, जय जवान’ का नारा लगाकर देश के किसानों को जो सम्मान दिया था कही-न-कही उसकी छवि आज धुंधली पड़ रही है। पर आज़ादी के समय से लेकर अगर अभी तक के समय मे कृषि क्षेत्र से आने वाले राजस्व को देखा जाये तो उसमे तरक्की ही हुई है। यानि कृषि की योग्यता को किसी भी मायने मे कम आकना गलत होगा।

60 के दशक मे आई हरित क्रांति ने तो जैसे कृषि क्षेत्र को एक नया आयाम दिया। खेती के लिए नई तकनीक, सिंचाई सुविधाओं का विस्तार व बेहतर गुणवत्ता के लिय अच्छे बीज उपलब्ध कराने से सुधार और बढ़ा। लेकिन वक़्त के साथ-साथ मानो देश मे विकास के मायने बदलने लगे और आज तकनीकी, इंडस्ट्रि एवं IT सैक्टर ने अपनी मज़बूत जगह बना ली है। उसके आगे किसान व उनकी मेहनत नज़रअंदाज़ हो रही है।

गर्मी का मौसम आते ही आए-दिन किसानों के आत्म-हत्या की ख़बरे आती रहती है। अब इसका कारण भी सबके सामने साफ है कि कभी वो किसान सूखे की मार नहीं झेल पाता, तो कभी कर्ज़ ना चुका पाने का दबाव उसे मरने को मजबूर करता है। ये कहना गलत नहीं होगा कि इस तरह एक-एक किसान की मौत पर कृषि क्षेत्र का क्या हाल होने वाला है। इसके अलावा और कोई वजह देखी जाये तो पता चलता है कि किसानों मे फसलों को लगाने से लेकर, सही बीज की पहचान करने की उचित समझ भी नहीं है। क्या करने से उसकी फसल अच्छी हो – ये बात भी उसकी फसल की उपज और क्वालिटी पर काफी प्रभाव डालती है। किसानों की मदद के लिय चाहे किसान कॉल सेंटर चलाये जा रहे हो, पर चिंताजनक स्तर पर कृषि के हाल को देख लगता है की अभी भी काफी सुधार की जरूरत है।

सरकार ने बेशक साल 2000 मे “National Agriculture Policy” के तहत ये योजना बनाई कि ग्रामीण इलाकों मे ही रोजगार के साधन तैयार करके वहा की आबादी के पलायन को रोका जा सके। पर आज ये बहुत देखा जा रहा है कि कृषि मे फ़ायदा न देखकर काफी किसान जमीन मालिक अपनी-अपनी जमीन बेचकर या तो विदेशों की ओर रुख कर रहे है या फिर उसके बदले कोई नया व्यापार। इस बात का ये साफ सबूत है की ये लोग कृषि को किसी भी मायने मे फ़्यादेमंद नहीं समझते और इसके बाद बचते है वो गरीब बिना पढ़े-लिखे किसान जोकि सही रूप से खेती करने की धारणा को समझते नहीं। अच्छी फसल न होने पर सिर्फ अकेले यही नुकसान नहीं उठाते बल्कि दूसरी इंडस्ट्रीज़ मे काम करने वाले लोग भी चीज़ों के बढ़ते दाम से परेशान रहते है।

किसान की जमीन और उसकी मेहनत की कड़ी कितनी ऊपर तक जुड़ी है इसके मतलब को समझना जरूरी है। 60 के दशक की हरित क्रांति से जो लक्ष्य पाने की उम्मीद रखी गई थी उसे पूरा करने मे समय तो लगेगा। हरित क्रांति से कुछ कदम आगे बढ़कर जरूरी है कि किसानों के दिमाग मे organic खेती करने के विचारों को भी मजबूती दी जाये। शहरों की तरफ किसानों के पलायन को सीमित करने के साथ-साथ आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण से पैदा होने वाली चुनौतियों से किसानों के हितों की रक्षा करना बहुत जरूरी हो गया है। इंपोर्ट-एक्सपोर्ट के व्यापार से जितना revenue सरकार कमाती है, समझना होगा कि आखिर एक किसान उसमे क्या हिस्सेदारी निभाता है। जिस दिन इस बात को समझ लिया जाएगा उस दिन देश, विश्व स्तर पर एक बार अपनी कृषि का लोहा मनवा सकेगा।